Ghansyam Sharma / Sat, Jun 7, 2025 / Post views : 185
जीवित धरोहर तातीराम विश्वकर्मा इलाज को मोहताज
कोण्डागांव। पत्रिका लुक (राजेन्द्र प्रसाद शर्मा)
लौह हस्तशिल्प की दुनिया में अपनी अद्वितीय कला के लिए राज्य पुरस्कार से सम्मानित कोंडागांव जिले के सुप्रसिद्ध शिल्पकार तातीराम विश्वकर्मा इन दिनों गंभीर रूप से बीमार चल रहे हैं। उनके स्वास्थ्य की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है, और वे शासन से त्वरित चिकित्सा सहायता की अपेक्षा कर रहे हैं। दुर्भाग्यवश, अब तक उन्हें शासन की ओर से कोई ठोस सहायता नहीं मिल पाई है।
तातीराम विश्वकर्मा केवल एक शिल्पकार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक धरोहर के संवाहक हैं। उन्होंने परंपरागत लौह शिल्पकला को जीवित रखा है, जो आज भारत के चुनिंदा क्षेत्रों में ही शेष है। उनके हाथों में ऐसा हुनर है, जो न केवल कलाकृतियों में जान डालता है, बल्कि कोंडागांव की पहचान को अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी पहुंचा चुका है।
कला में सिद्धहस्त, लेकिन स्वास्थ्य के लिए बेबस
कोंडागांव जिले के ग्राम किड़ईछेपड़ा (ग्राम पंचायत डोंगरीगुड़ा) निवासी तातीराम विश्वकर्मा ने परंपरागत तकनीकों से लुहा घाना (कच्चा लोहा) से शुद्ध लोहा निकालने की विलुप्त होती तकनीक को आज भी जीवित रखा है। यही नहीं, उन्होंने राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित अनेक शिल्प प्रदर्शनियों में भाग लेकर न केवल राज्य का मान बढ़ाया, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्यपाल के.एम. सेठ जैसे विशिष्टजनों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो एक बार शिल्प प्रदर्शनी में उन्हें उनके नाम से पुकारते हुए संबोधित किया था। राज्यपाल के.एम. सेठ ने उनके ग्राम निवास पर पहुंचकर स्वयं उनकी कार्यशाला का अवलोकन किया था और परंपरागत लोहा निकालने की प्रक्रिया का जीवंत प्रदर्शन भी देखा था।
शासन की संवेदनहीनता पर उठते सवाल
आज वही कलाकार, जो राज्य की सांस्कृतिक पहचान और गौरव का प्रतीक हैं, जीवन-मरण की स्थिति में शासन की मदद की राह देख रहे हैं। यह न केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा है, बल्कि राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की भी अवहेलना है। हस्तशिल्प के क्षेत्र में कार्यरत स्थानीय कला प्रेमियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि तातीराम जैसे कलाकारों के लिए शासन को विशेष चिकित्सा सहायता एवं आर्थिक सहयोग की तत्काल व्यवस्था करनी चाहिए। परंतु, ऐसा प्रतीत होता है कि जिले में संचालित शिल्प विकास विभाग को उनके हालात से कोई सरोकार नहीं है।
कला के प्रति उपेक्षा: एक बड़ा सवाल
यह एक चिंताजनक संकेत है कि जिन कलाकारों ने राज्य की पहचान को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया, उन्हें उनके कठिन समय में अकेला छोड़ दिया जा रहा है। यह सोचने का विषय है कि क्या शासकीय योजनाएं केवल कागजों तक सीमित हैं? क्या पुरस्कार केवल समारोहों की औपचारिकता हैं? अगर तातीराम जैसे सिद्धहस्त शिल्पकार आज इलाज के लिए मोहताज हैं, तो यह न केवल प्रशासन की नाकामी है, बल्कि समाज के सांस्कृतिक मूल्यों पर भी प्रश्नचिन्ह है।
मांग: तात्कालिक सहायता और दीर्घकालिक नीति
तातीराम विश्वकर्मा की चिकित्सा हेतु तत्काल आर्थिक सहायता, विशेष उपचार हेतु रेफरल, तथा एक स्थायी "हस्तशिल्प कलाकार सहायता योजना" की आवश्यकता अब महसूस की जा रही है। इसके अंतर्गत विशेष कलाकारों को चिकित्सा बीमा, मासिक पेंशन और आकस्मिक सहायता राशि का प्रावधान किया जाना चाहिए।
साथ ही, संबंधित विभागों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिले के हर प्रतिभाशाली कलाकार की नियमित स्वास्थ्य जांच एवं कल्याण सुनिश्चित हो।
तातीराम विश्वकर्मा जैसे कलाकार सिर्फ लोहे की आकृतियाँ नहीं बनाते, वे संस्कृति की आत्मा को मूर्त रूप देते हैं। यदि समाज और शासन उन्हें उनके कठिन समय में सहारा नहीं देगा, तो यह न केवल मानवता की हार होगी।
आज आवश्यकता है कि शासन न केवल तातीराम जी की तात्कालिक सहायता करे, बल्कि हस्तशिल्प एवं पारंपरिक कला के संरक्षक कलाकारों के लिए स्थायी और प्रभावी नीति बनाए ताकि बुरे वक्त में काम आ सके।
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